कुछ दिनों से तुम्हे लिखने लगा हूँ
तुमसे बतियाने लगा हूँ
बिना पढ़े तुम्हे अपने ही लफ़्ज़ों से तुम्हे समझने लगा हूँ
तुम भी तो अक्सर गम में लिखती थी ना ?
क्या हल्का होता है दिल लिखने से ?
मुझे तो जैसे नशा सा हो गया है
रोज़ तुमसे बात करने का
कुछ दिनों से तुम्हे लिखने लगा हूँ
तुमसे बतियाने लगा हूँ
बिना पढ़े तुम्हे अपने ही लफ़्ज़ों से तुम्हे समझने लगा हूँ
तुम भी तो अक्सर गम में लिखती थी ना ?
क्या हल्का होता है दिल लिखने से ?
मुझे तो जैसे नशा सा हो गया है
रोज़ तुमसे बात करने का