मेरे बचपन के काठ वाले घर की जमीन
उस जमीन पर नीले शीशे की ईमारत है अब
घर के बहार वाली पान की दुकान
उसमे बैठने वाला जोगिन्दर अब बड़ा व्यापारी है
दुर्गा पूजा के मौसम में बारूद की टिकड़ियां बजाने को
और आये दिन चेक्लेस, नहीं बेचता अब
वो गद्दी जिसपे मेरे दादाजी बैठ पान चबाते थे,
मैं सिक्के गिनता और ताउजी रोकड़ लिखते थे
उस गद्दी का रंग सफ़ेद से मट मैला हो चला है
मेरे बचपन के काठ वाले घर की जमीन
उस जमीन पर नीले शीशे की ईमारत है अब
वो गोडाउन जो घर के पीछे था,
अब बेसमेंट में है
पहली मंजिल पर जहां हम रहते थे
किसी ने खरीद उसे शोरूम बना लिया है
इस शोरूम की एक खिड़की आज भी
उसी तरह ब्रह्मपुत्र को ताकती है
जिस तरह मेरे दादाजी की खिड़की
यह वही खिड़की है जिससे बचपन में
छुप कर छज्जे पे च्युइंग गम गिराता था मैं
इस कोने वाले कमरे की खिड़की पर
दिल्ली पढ़ने जाते मोहन भैया
दो आंसू बहा गए थे याद है मुझे
ये कमरा देश वाले ताउजी का था
अपनी बक्सा वो इसी मैं खोलते थे
बड़े गोल फूलने वाले गुब्बारे लाते थे
मुझे टाइगर बुलाते थे इसीलिए
पॉकेट पे टाइगर लिखी
नाईट सूट लाए थे एक बार
यहां एक ड्रावर भी था मेरा
पुराने टूथपेस्ट के डब्बे, गोटियां
मोंम और गत्ते रखता था उसमे
कभी नजरें छुपाते कैंची मिल जाती
तो कुछ बना लिया करता था
मेरे बचपन के काठ वाले घर की जमीन
उस जमीन पर नीले शीशे की ईमारत है अब
(2015)