ब्रह्मपुत्र के किनारे बचपन के उस काठ के घर में
जिसकी जमीन पर नीले शीशे की इमारत है अब,
उस घर में कुछ दुछत्तियों थी, कुछ तायखाने भी।
अलग अलग थे ,अलग अलग इस्तेमाल थे उनके,
अलग अलग चलो आज उन्हें याद करते हैं।
दुतल्ले पे पहुंची सीढ़ियों के
दाहिनी तरफ लटकती हुई सी
इक छाई रखने की जगह थी ।
हल्के, धूलि, टूटे किवाड़ पे
छोटी सी बस एक खुंटी थी ।
छत पर जाती फिर सीढ़ियों के
नीचे भी एक और जगह थी।
झाड़ू, गमला और वहां पर
कोयले का एक बस्ता था।
दाएं मम्मी पापा के
room के पीछे फैली थी,
बाएं चार सीढ़ियों के
नीचे जगह समेटे थी।
टीवी रूम के फर्श के
उस एक पट्टे पर चलो तो
सिसकियां वो लेता था,
क्यूंकि अपने नीचे भी
एक छोटा कमरा रखता था।
सूप जिस दिन बनता था,
साल भर के लिए,
सॉस भी तो बनता था।
मोम से pack बोतलों को
फिर माएं यहां रखती थी।
गद्दी को जाती सीढ़ियों के
आधे दम, दाहिनी तरफ पर
नींबू रंग के चुने रंगा
Aluminium का दरवाज़ा था।
बल्ब की छोटी रोशनी में
जाने क्या ये रखता था,
दूर गद्दी के ऊपर खुलती
जगह पर तो inverter था।
दादी के उस कमरे में
नए बर्तन कि अलमारी थी,
सिर पर रजाई तकिए रखी
चांग को वो चलती थी।
लोहे, aluminium, VIP ke,
कुछ लाल कपड़े में बंधे,
बक्से और गठरे रहते थे।
जानते हो और यहां
Shot लगे तो छक्का था।
छत की आखिरी चार
सीढ़ियां फिर ना चढ़ो तो
असली जगह पर आए हो।
साइकिल, कढ़ाई और भट्टी
पल्ले, दरवाजे, और आडी –
सुलगी टीने की छत के नीचे
यूं आसमान सी चांग थी !
सब मैली थी दूछत्तियां थी,
अंधेरी बंद डरावनी सी।
अंदर अपने लेकिन सब
कबाड़ छुपे रखती थी,
उस छोटे काठ के मकां को
घर बनाए रखती थी।