भाग १
कुछ चिट्ठियां कुछ नज़्में
कुछ तुम्हे लिखी कुछ तुम पर
कुछ डायरियों में, कुछ phone पर
यूँ ही पड़ी हैं, तुम्हारा पता नहीं मालुम
ढूंढता हूँ तुम्हे अक्सर
कभी ख़यालों , कभी अल्फ़ाज़ों में
चंद तस्वीरों में जो हमने साथ खींची थी
कभी उनमे जो तुमने Insta पर डाली थी
बीते साल एक दोस्त मिली, चहकती, इठलाती सी
तुम नहीं पर तुम सी
ढूंढा तुम्हे उसमे भी
कुछ हद तक तुम्हे पाया भी
वो चिट्ठियां और नज़्में उसे दे दूँ
ये सोच कई दफे मुस्कुराया भी
पर तुम सी है तुम नहीं,
यूँ बार बार हिचकिचाया भी
नाराज़ हो जाओगी शायद सोच
वो चिठियाँ वो नज़्में
कुछ डायरियों में, कुछ phone पर
यूँ ही पड़ी हैं, तुम्हारा पता नहीं मालूम
…
भाग २
बीते साल जो दोस्त मिली थी
चहकती इठलाती सी
हम अच्छे दोस्त हो चले हैं
जैसे हम होते आज अगर तुम होती
चूंकि अब वो साथ नहीं रहती
कुछ चिट्ठियां कुछ नज़्में
कभी phone कभी email पर
लिखता हूँ, कभी उससे मिलती हैं
वो चिट्ठियां और नज़्में
कुछ तुम्हे लिखी कुछ तुम पर
कुछ डायरियों में, कुछ phone पर
तुम्हे पढ़ाता हूँ, तुम्हारा पता अब मालूम है