यहाँ, इन गलियों में,
बचपना रहता है मेरा
आजकल बूढ़ा कर रिटायरमेंट बिता रहा है
मैं नहीं आता पर नींद मेरी
अक्सर खो जाती है यहाँ
लोरियाँ ना जाने कौनसी
छिप कर सुना करती है
घूमती है इस मोहल्ले में वो घंटों
बचपन लड़कपन की कहानियाँ चुना करती है
सो जाती है फिर थक कर उसी घर की जमीन पर
जिसे फिर वैसा ही बना पाने के ख़्वाब बुना करती है
मेरी नींद इस मोहल्ले में अक्सर
मेरा बचपना ढूंढा करती है
पीछे homework वाले नुक्कड़ से
वो, वहाँ कंप्यूटर पॉइंट तक
भागता नज़र आता है
और, अगली गली में बाएं और एक तालाब है
बारिशों पे काग़ज़ की नाव पे चढ़
उसे खिवाता नज़र आता है
यहां इन गलियों में मेरा
बचपना नज़र आता है
इस काठ के घर की खिड़की से
ब्रह्मपुत्र को ताकता नज़रआता है
तो कभी इसी खिड़की से लटक कर
छज्जे पर च्युइंग गम चिपकाता नज़र आता है
यहां इन गलियों में आज भी
मेरी नींद को मेरा बचपना नज़र आता है
अब वक़्त के चलते जरा कमज़ोर हो गया है
मेरा बचपना अब बूढ़ा कर retire हो गया है
चलता फिरता नहीं, हाँ पुकारता है कई दफ़े
बूढ़े बाप की तरह मगर मैं उसे
टालते रहता हूँ , टालते रहता हूँ