अचार डाला है कभी ?
भावनाओं का, विचारों का
नासमझी या गलत फ़हमियों का,
अचार डाला है कभी ?
मेरी तो एक अलमारी है
डाले और मिले आचारों की।
कुछ खाने और खिलाने के,
सजाने, कुछ दिखलाने के।
कुछ बरसों पुराने भांडों में,
कुछ रंग बिरंगे डिब्बों में।
कुछ मीठे हैं, कुछ तीखे भी,
कुछ खट्टे, खट्टे – मीठे भी।
कुछ लुंजी हैं, कुछ सूखे भी,
कुछ डाले, कुछ डलवाए भी।
यूं मोटामोटी सब same तो हैं
कुल 3 ही अचार के taste तो हैं
फिर भी कुछ fancy prawn के हैं,
मांओं के हाथ के आम के हैं।
घर के खाने की शान से हैं,
Taste छुपाते, बेईमान से हैं।
ये बहकी बहकी बातें हैं,
बेतुका तुक भिड़ाये हो।
कौनसे अचार हैं ये भाई?
जबरदस्ती क्यों लिख लाये हो?
प्च, समझे नहीं तो फिर सुनो,
मेरी एक अलमारी है
आचारों और विचारों
डाले और मिले अचारों की।
जब मेरे घर कोई आता है,
इस समाज के ठेकेदार,
दोस्त करीबी या दूर के,
उनकी पसंद के दो डब्बे
trending अचार में रखता हूं।
कुचले इतिहास के टुकड़ों का,
सदियों से बिकता मेरे देश में,
खाता नहीं जिसे कोई भी,
वो राष्ट्रवाद तीखा अचार है।
जो ना भाये जिसे राष्ट्रवाद तो,
आस्थाओं के टुकड़े काट कर,
हिन्दू, मुस्लिम, सीख, ईसाई कर,
Secularism फिर मीठा अचार है।
Instagram या Facebook पर,
चाय पे चर्चा, नुक्कड़ पर,
भाषण संवाद विवादों में,
चाटे-चटवाये जाते हैं।
ऐसे अचार इस देश में
चाटे-चटवाये जाते हैं।