डायरियां


ये जो डायरियां तुम लिखा करती थी रोज़
संझो रखी है शेल्फ के एक कोने में

खींचती हैं, पुकारती हैं मुझे
“Bhaiya, suno na!”
जैसे whatsapp पर लिखती थी तुम, याद है ?

दिल करता है पढूं इनको, एक पन्ना रोज़
तुमने ज़रूर सब उढेल रखा होगा इनमें

अक्सर अचानक ही text मिलता था
कुछ लाइनें कविता सी लिख भेजती
इन डायरियों में और होंगी ना ? कविताएं तुम्हारी ?

ये जो डायरियां तुम लिखा करती थी रोज़
धूल खा रही है शेल्फ के एक कोने में

खींचती हैं, पुकारती हैं मुझे
“Bhaiya, suno na!”
भूले भटके एक आध पन्ना पलटता हूँ
पढता नहीं पर, तुम मना करती थी ना ?

अफ़सोस है की मुझमे हिम्मत नहीं है
इन्हे पढ़ने की तुम्हे समझने की

माँ कहती हैं “तुम ही कुछ करो इनका
वो publish होना चाहती थी ना ?”
मुझमे हिम्मत नहीं है
इन्हे पढूं भी और जीयूं भी
तुम्हे समझूँ भी खुद सम्भलूँ भी

उस दिन जब सामान समेट रहे थे तुम्हारा
गूगली बोली “दीदी बोलती थी बेटी पढ़ेगी मेरी”
चुभती है ये बात मुझे नाराज़ हूँ मैं
नाराजगी तुमसे नहीं खुद से है
कमी रह गयी थी प्यार में मेरे
जो मैं तुमसे कुछ थोड़ा और बतियाता
शायद तुम्हे इन डायरियों की जरुरत न होती
ये डायरियां जो धूल खा रही है शेल्फ के एक कोने
ये सारी शायद मेरे ज़ेहन में होती

आये दिन कुछ पन्ने पलट लेता हूँ
कुछ शब्द कुछ अक्षर देख लेता हूँ
सुकून मिलता है, पढता नहीं पर
तुम मना करती थी ना ?

पर जानती हो ना कैसा हूँ ?
Curiosity isn’t a sin समझती हो
किसी रोज़ चोरी छुपे पढूंगा इन्हे
अभी बस हिम्मत जुटा रहा हूँ
समझूंगा तुम्हे, संभल लूँ थोड़ा मैं

इसीलिए डायरियां जो लिखा करती थी रोज़
संझो रखी है शेल्फ के एक कोने में

(2017)

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