अभी पिछली दिवाली पर, जब घर गया था, पिताजी ने…
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यूँ तो “अब्बू ” ज़रा प्यारा है
क्यूंकि फिल्मों कविताओं में सुनता हूँ,
पर उनको “पिताजी” ही पसंद है।
वैसे भी इतने बरसों से “पापा” से
काम चलाते आये हैं पिताजी
क्यूंकि मैं भी तो बस बिच में एक आध साल
“पापाजी” तक ही पहुंच पाया हूँ।
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खैर! तो हाँ क्या कह रहा था मैं ?
की अभी पिछली दिवाली पर, जब घर गया था मैं ,
पिताजी ने मेरी किसी ना समझी पर,
हमारी dinner के बाद वाली चाय के दौरान…
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ख्याल आया तो कह ही देता हूँ
उनसे बात करते खुद को
स्कूटर के पीछे, या पहले तो आगे भी
या शुक्रेश्वर बाबा के रस्ते में,
या आज कल तो फ़ोन पर,
या फिर दिवाली-होली इस चाय
के वक़्त टीवी देखते पाता हूँ
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खैर ! इसी तरह digress होता रहा
तो रात काली हो जाएगी। .
हाँ तो.. उस चाय के दौरान पिताजी ने
कुछ कहा था जो शायद उस वक़्त
कहीं बैठ गया था मन में।
महीनों बाद मेरे flatmate के
इन lockdown के दिनों में
इत्तेफाक से दोहराने पर
वो याद आया तो समझ पाया…
उन्ही की एक मनचाही नसीहत
जो उलझी पड़ी थी दिमाग में,
दिल का रास्ता नाँप लेने की
धमकियां दे रही थी मुझे।
उनका कहा उस उलझन को सुलझा गया
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देखो मैं फिर भटकना नहीं चाहता पर
कुछ ख्याल अच्छे इत्तेफाकन आते हैं
और ज़रा मामूली होते हैं तो भूले जाते हैं
की अभी नहीं तो कभी नहीं ।
कई बार उनकी कुछ बातों को
बाद में समझ कर ऐसा लगता है
की जाने ये समझायी गयी थी या
मुझे अपने आप को समझाने का
बस रास्ता दिखाया था ?
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खैर ! हाँ तो अब शब्दशः तो याद नहीं पर
वो कह रहे थे इतना की
“परिवार का कोई भी सदस्य कैसा भी हो
तुम सा नहीं तो कम से कम तुम्हारा ही रहेगा
तो उनसे नाते मजबूत ही रखने हैं”
मैं परिवारजनों के समूह में अक्सर
liberalism और secularism की बहस छेड़ते
कटाक्ष ये कहता हूँ की समाज कुछ भी करे
हमें सांप्रदायिक विचारों से दूर रहना चाहिए।
बहरहाल, मैं अपने ही दोस्तों रिश्तेदारों को
अक्सर अपने स्वार्थ के तराजू में
यूँ बेहिचक, बेहया तोलता हूँ।
फिर उन्ही को मैं बार बार
उदारवाद की अदालत में
मनचाहे कठघड़े में रखता हूँ।
ये कौनसा सीना पीटता हूँ मैं ?
क्या सच में secular हूँ मैं ?
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हम खुद अपने आप के बराबर अपने स्वार्थ के परे
अपने दोस्तों परिजनों को नहीं रखते जब तक
नहीं रख सकते किसी धर्म किसी जाती से
निर्पेक्छ्ता की अपेक्छा तब तक।
The gold standard of equality
we demand at a societal level,
The gold standard of equality
we think we have for the society.
We often don’t have that for the
closest people in our lives
who in fact could be our universe!
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On a vaguely similar comparison of societal goals with realities of personal lives (a tangential exploration of charity begins at home): feminism