गुलछर्रे


इश्क़ की सिफ़ारिश ना समझना
मेरी मुआब्ज़े की अर्ज़ियों को

एक दिन की मुलाक़ात में
जो धज्जियां तुमने उड़ाई है

अरमानों की मेरे जिन्हे
गुलाबी गुलछर्रों सा उड़ना था

इन चीथड़ों को बस ज़रा समेट दो

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *