अब गुजरते तो हो
पर मिलते नहीं।
मैं धुप और छाँव की
चादर जो नहीं बिछाता।
हवाओं में
सूखे पत्ते नहीं झड़ते
नंगे पैर जिन पर चल तुम
मुझे जगा सको।
उन दिनों की बस यादें हैं
सूखी टहनियों से जिनकी
कहानियां बुनता हूँ
फ़िज़ाओं में की शायद,
शायद किसी शहर, किसी गांव में
तुम्हे सुनाई दे।